स्मार्ट डिजिटल शिक्षा माध्यम से परम्परागत शिक्षा की ओर पुनरागमन

स्मार्ट डिजिटल शिक्षा माध्यम से परम्परागत शिक्षा की ओर पुनरागमन

प्राचीन शिक्षा विशेषकर मानसिक और आध्यात्मिक विकास पर बल देती थी जिसके अनुसार केवल ज्ञानार्जन एवं अनुशासन आदि को ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य माना जाता था। आधुनिक शिक्षा व्यक्ति के न केवल मानसिक और आध्यात्मिक विकास पर बल देती है बल्कि शारीरिक एवं सामाजिक विकास तथा आवश्यकता या बाज़ार के अनुसार भी शिक्षा पर भी बल देती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आधुनिक शिक्षा/डिजिटल शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास तथा उसमें सामाजिक कुशलता के गुणों का विकास करना है।

 

प्राचीन भारत में शिक्षा की व्यवस्था के लिए गुरुकुल प्रणाली का विकास किया गया था | उस समय कागज का अविष्कार नहीं हुआ था , इसलिए पुस्तको द्वारा शिक्षा देने का प्रश्न ही नहीं उठता | उस समय सब प्रकार की शिक्षा मौखिक या व्यवहारिक रूप में दी जाती थी | इसलिए उस समय के विद्यार्थी जो कुछ पढ़ते थे उसे जन्म भर के लिए स्मरण शक्ति द्वारा सुरक्षित बना लेते थे |

 

विद्यार्थियों को स्वावलंबन का पाठ पढ़ाया जाता था जिससे वह अपने आगामी जीवन में कंही भी और कैसी भी परिस्थिति में अपने पैरो पर खड़ा हो सकता था |

 

शिक्षा की परंपरागत प्रणाली ही भारत की पहचान है। आधुनिक शिक्षा तभी सुद्रण होगी जब वह शिक्षा की भारतीय परम्परा को आत्मसात करेगी। आत्मनिर्भर भारत के लिए शिक्षा में रूपांतरण अति आवश्यक है।

 

शिक्षा प्रागितिहास में शुरू हुई, क्योंकि वयस्कों ने युवाओं को उनके समाज में आवश्यक ज्ञान और कौशल में प्रशिक्षित किया। पूर्व-साक्षर समाजों में, यह मौखिक रूप से और नकल के माध्यम से प्राप्त किया गया था। कहानी सुनाने से ज्ञान, मूल्य और कौशल एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा। जैसे-जैसे संस्कृतियों ने अपने ज्ञान को कौशल से आगे बढ़ाना शुरू किया, जिसे नकल के माध्यम से आसानी से सीखा जा सकता था, औपचारिक शिक्षा विकसित हुई।

 

इधर तेरहवीं शताब्दी में कागज तथा पंद्रहवी शताब्दी में छापने के यंत्रों का अविष्कार हो गया जिसके परिणामस्वरूप जन-साधारण को भी इन स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने के अवसर मिलने लगे।

 

पेस्टालॉजी ने इन स्कूलों के सम्बन्ध में ठीक ही लिखा है – “हमारे अमनोवैज्ञानिक स्कूल बालकों को अनके प्राकृतिक जीवन से दूर कर देते हैं, उन्हें अनाकर्षक बातों को याद करने के लिए भेड़ों के समान हांकते हैं तथा घण्टों, दिनों, सप्ताहों, महीनों एवं वर्षों तक दर्दनाक जंजीरों से बांध देते हैं।“

 

शिक्षा को अपने सांस्कृतिक जीवन मूल्यों का ठोस आधार और भारतीयता का व्यापक संदर्भ देना यह प्रमुख मुद्दा है। शिक्षा को सिर्फ परीक्षाओं में आने वाले सवालों के जवाब देने तक सीमित रखने के बजाय जीवन उन्मुखी बनाने का प्रयास होना अत्यंत आवश्यक है। विद्यार्थी को मनुष्य बनाना यही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है। व्यक्ति को मनुष्य बनाना इसका मतलब यह होता है कि राष्ट्र और समाज के प्रति संवेदनशील बनाना। यही संवेदनशीलता मनुष्य को सामाजिक एवं राष्ट्रीय मुद्दों से जोड़ती है। गत 70 सालों से चली आ रही शिक्षा प्रक्रिया को हम देखते हैं तो वह हमारी मानवीय स्वतंत्रता और संवेदनशीलता का दमन करने वाली महसूस होती है। समाज में अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा को उकसाने वाली, मनुष्य को निर्जीव अंक एवं आंकड़ों से जबरन जोड़कर रखने वाली मालूम पड़ती है।

 

इस प्रकार की शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों में भारतीय मूल्य और जीवन से जुड़े मूल्यों के प्रति वास्तविकता और व्यवहार में निष्ठा का विकास करने वाली कैसे संभव हो सकती है?

 

इस प्रकार परम्परागत शिक्षा कागज विहीन होने से लेकर पुस्तकों के रूप तक का सफ़र तय किया और पुँनः अपने वर्तमान समय में परम्परागत रूप को तकनीकी स्वरुप लेकर आधुनिक शिक्षा जगत में प्रवेश किया | जिसे डिजिटल शिक्षा अथवा स्मार्ट बोर्ड कम्प्यूटर आधारति शिक्षा प्रणाली के रूप में जाना जाता है |

 

 उत्तर प्रदेश के परिषदीय स्कूलों में स्माइल फाउंडेशन का द्वारा इस डिजिटल शिक्षा अथवा स्मार्ट बोर्ड कम्प्यूटर आधारति शिक्षा प्रणाली का शुभारम्भ जनपद गोंडा मी किया गया और शिक्षा के क्षेत्र में नई तकनीकी का समावेश किया गया |

 

डिजिटल शिक्षा अथवा स्मार्ट बोर्ड कम्प्यूटर आधारति शिक्षा

 

ये शिक्षा प्रणाली  कागज मुक्त शिक्षा है | जो की पूर्णता सहज और सरल तथा मात्रभाषा ने निर्मित पाठ्यक्रम को संगृहित कर बच्चो के अधिगम को सुगम बनता है |

 

शिक्षण पाठ्य को हम तीन स्तरों में बांट सकते हैं :-

1. स्मृति स्तर (Memory Level)

2. बोध स्तर (Understanding Level)

3. चिंतन स्तर (Reflective Level)

 

स्मृति स्तर

 

 स्मृति स्तर में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न की जाती है, जिससे छात्र पढ़ाई की विषय वस्तु को (Content) आत्मसात कर सकें । इस स्तर पर प्रत्यास्मरण क्रिया पर जोर दिया जाता है । स्मृति शिक्षण में संकेत अधिगम (Signal Learning), शृंखला अधिगम (Chain Learning) पर महत्व दिया जाता है ।

 

बोध स्तर पर शिक्षण

 

बोध स्तर के शिक्षण में शिक्षक छात्रों के समक्ष पाठ्यवस्तु को इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि छात्रों को बोध के लिए अधिक से अधिक अवसर मिले और छात्रों में आवश्यक सूझबूझ उत्पन्न हो। इस प्रकार के शिक्षण में छात्रों की सहभागिता बनी रहती है । यह शिक्षण उद्देश्य केन्द्रीय तथा सूझबूझ से युक्त होता है।

 

चिन्तन स्तर पर शिक्षण

 

चिंतन स्तर में शिक्षक अपने छात्रों में चिंतन तर्क तथा कल्पना शक्ति को बढ़ाता है ताकि छात्र दोनों के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान कर सके । चिंतन स्तर पर शिक्षण समस्या केंद्रित होता है । इस स्तर में अध्यापक बच्चों के सामने समस्या उत्पन्न करता है और बच्चों को उस पर अपने स्वतंत्र चिंतन करने का समय देता है । इस स्तर में बच्चों में आलोचनात्मक तथा मौलिक चिंतन उत्पन्न होता है।

 

डिजिटल शिक्षा अथवा स्मार्ट बोर्ड कम्प्यूटर आधारति शिक्षा प्रणाली  के प्रति नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का समर्थन

 

नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मे शिक्षा क्रांति का दावा सम्मिलित है। इसमें पाठ्य-पुस्तकों का बोझ कम करके पढ़ाई को अधिक से अधिक प्रयोगात्मक बनाने की बात कही गयी है। यह सर्वविदित तथ्य है कि जिस शिक्षा पद्धति को यह नीति विकसित करना चाहती है उसमें सर्वाधिक सहायक ऑनलाइन शिक्षण प्रणाली ही हो सकती है। सतत विकास के चौथे लक्ष्य “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा”, जिसमें समावेशी व न्यायसंगत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को सुनिश्चित करने का लक्ष्य है, की वास्तविक प्राप्ति सभी वर्गों को शिक्षण प्रक्रिया में शामिल किये बिना संभव नहीं हो सकती। चूंकि ऑनलाइन शिक्षण व्यवस्था में बिना किसी बाधा के हर आयु और वर्ग को सम्मिलित किये जा सकने की संभावना है, इसलिए यही एसडीजी-4 का सर्वोत्तम साधन परिलक्षित होती है।

 

सर्वसुलभ होने के साथ-साथ कुछ और बिन्दु ऑनलाइन शिक्षण प्रणाली के महत्व को उजागर करते हैं, जैसे इसकी लागत कम होना, परंपरागत कक्षाओं से अधिक शिक्षार्थियों को एक साथ सम्मिलित कर सकना, अधिक दृश्य-श्रव्य सामग्री के उपयोग की सुविधा, कईं शिक्षकों द्वारा एक ही मंच पर एक साथ बहुपक्षीय संवाद की सुविधा, वस्तुनिष्ठ ऑनलाइन परीक्षाओं की सुविधा,  ई-लर्निंग के स्रोत जैसे स्वयं, स्वयंप्रभा, ज्ञानदर्शन आदि के विकास के साथ अनेक ऑनलाइन कोर्स, शोधपत्र, ईबुक्स की उपलब्धता आदि।

 

परंपरागत शिक्षा पद्धति कोई आलोचना का विषय नहीं है। यह पद्धति धीरे-धीरे तकनीकों का सहारा लेकर अपने अस्तित्व को पुनः कायम कर लिया है |

 

परिवर्तन यदि समाज के लाभ के लिए हो रहा है तो उसे न स्वीकारना, समाज के विकास में बाधक बनना है। यही स्थिति ऑनलाइन शिक्षण प्रणाली के आलोचकों की भी है, जो किन्हीं व्यक्तिगत कारणों या पूर्वधारणाओं के कारण इसके महत्व को अनदेखा करना चाहते हैं। शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों- ज्ञान सृजन, ज्ञान का प्रसार तथा ज्ञान का सरक्षण- तीनों को ही प्राप्त करने मे ऑनलाइन शिक्षण प्रणाली का विशेष महत्व है और इसका लचीलापन इसे और अधिक उपयोगी बना देता है।

 

इस प्रकार से परम्परागत शिक्षा अपने प्राचीन स्वरूप को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के डिजिटल माध्यमो के द्वारा वापसी किया है | और शिक्षा मौखिक या व्यवहारिक रूप में विद्यार्थी के अधिगम स्तर में वृधि और स्मरण शक्ति को सुद्रढ़ करने , स्वावलंबन तथा किसी भी परिस्थिति में अपने पैरो पर खड़ा होने की क्षमताओ के विकास पर बल दे रही है |

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